
महाकुम्भ का विहंगम दृश्य
१४ जनवरी, २०१० को उत्तराखण्ड के हरिद्वार में मकर संक्रान्ति के दिन शुरु हुआ इस सदी का पहला महाकुंभ २८ अप्रैल, २०१० को वैशाख पूर्णिमा के दिन समाप्त हो गया। वैसे तो महाकुम्भ सफल ही रहा लेकिन १४ अप्रैल को शाही स्नान के दिन मची भगदड़ ने दुनिया के सबसे बड़े पर्व पर ७ मौतों की कालिख मल दी। बताया जा रहा है कि कई लोग अब भी गायब हैं, सच्चाई क्या है, मां गंगा ही जाने! इस पर्व पर केन्द्र की सरकार ने भी उदारता से पैसा दिया और राज्य सरकार ने भी काम अच्छा किया, कई काम स्थाई हुये लेकिन कई काम और हो सकते थे, जो कि नहीं हो पाये।
इस पोस्ट को लिखने का विचार मुझे यूं आया कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री जी ने एक बयान में कहा कि कुम्भ के सफल आयोजन के लिये हमें नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिये। दो-तीन दिन बाद भारर सरकार के कैबिनेट सेक्रेट्री साहब मसूरी आये तो उन्होंने पढे-लिखे आदमी जैसी बात कह दी कि भई नोबेल पुरस्कार में तो मेलों का आयोजन कराने वालों की कोई कैटेगरी ही नहीं है। आप गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में नाम दर्ज करवाओ। ये तो ठहरी अखबारी चर्चा, लेकिन धरातल में देखा जाय और अगर पुरस्कार लेना जरुरी ही है, तो हरिद्वार शहर, मेला क्षेत्र के मूल निवासियों को कोई न कोई पुरस्कार जरुर मिलना चाहिये। क्योंकि इस पूरे चार महीने के मेले में जो दुश्वारियां उन बेचारों ने झेली है, उसे हर कोई नहीं झेल सकता। एक छोटे से शहर में, जहां संकरी गलियां हों, वहां पर एक ही दिन में करोडों-करोड़ लोग आ जांय। सुरक्षा के नाम पर या जरुरत कह लीजिये, आज के जमाने में, पूरा शहर छावनी बन जाता है। आदमी को अपने घर में जाने पर भी पुलिस टोका-टोकी करने लगती है। शहर की यातायात व्यवस्था चरमरा जाती है। न जाने कितने जोन प्रशासन बना देता है हरिद्वार के, एक जोन तो जीरो जोन है, जिसमें पैदल चलने के लिये भी पास चाहिये। शाही स्नान से चार दिन पहले और चार दिन बाद तक यही स्थिति रोटी-दूध का बंदोबस्त पहले से कर लो। इतनी दुश्वारी के बाद भी हरिद्वार वालों के जज्बे को मानना पड़ेगा साहब, उनके लिये यह कुम्भ आफत-ए-जान नहीं, एक जिम्मेदारी है, यहां आने वाला यात्री उनके लिये महज कुम्भ नहाने आने वाला व्यक्ति न होकर अतिथि है। सबने पुलिस के साथ , प्रशासन के साथ, श्रद्धालुओं के साथ को-आपरेट किया।
यह स्नान १४ जनवरी को १० डिग्री तापमान पर शुरु हुआ और २८ अप्रैल को ४० डिग्री पर खत्म हुआ। हरिद्वार के लोगों ने श्रद्धालुओं को पहले कम्बल ओढाये, अलाव तपाये और मार्च के महीने से पानी पिलाया। १४ तारीख के शाही स्नान के दिन लोग घरों से बाहर नहीं निकल पा रहे थे, लेकिन अपने छज्जों से वह महात्माओं पर फूल बरसा रहे थे, प्यासों को पानी पिलवा रहे थे। यह होता है जज्बा और जिम्मेदारी, आज के जमाने में कोई किसी की तरफ देखने की फुर्सत नहीं रखता। लेकिन हरिद्वार आकर देखिये, आज भी कई नवयुवक बिना किसी लालच के वालिंटियर बने हैं, किसी को रेल में किसी को बस में चढ़वा रहे हैं। बिछुड़ों को मिला रहे हैं, मार्ग की स्थिति बता रहे हैं। अभी इधर हरिद्वार आना-जाना ज्यादा ही हुआ, हरिद्वार से पांच-छः कि०मी० पहले से ही गुवानि बास (मानव मल की दुर्गन्ध) से सामना हुआ। लेकिन हरिद्वार के लोग पहले जैसे ही व्यवहार कर रहे हैं और यह शहर आज से ही २०२१ के महाकुम्भ और २०१६ के अर्द्धकुम्भ की तैयारियों में जुटा है।
मेरा सलाम है, हरिद्वार वासियों के जज्बे को। अगर किसी को इस महाकुम्भ के आयोजन के लिये कोई पुरस्कार मिलना चाहिये तो वह यहां की जनता को मिलना चाहिये।

पुरस्कार तो उन पुलिस कर्मियों को भी मिलना चाहिये, जिन्होंने १० डिग्री तापमान की ठिठुरन से लेकर ४० डिग्री के झुलसते तापमान के साथ काम किया। १४ मार्च के दिन पुलिस तत्पर न रहती को बड़े हादसे से इन्कार नहीं किया जा सकता था। पुलिसकर्मी एम्बुलेंस का इंतजार न कर खुद ही लोगों को कन्धे पर डाले अस्पताल लेकर गये। बिना खाये-पिये दिन-रात मुस्तैदी से ड्यूटी बजाने वाले पुसिसकर्मियों को कम से कम एक इन्क्रीमेंट का लाभ दिया जाना चाहिये, जिससे उनका मनोबल बढे।