आज उत्तराखण्ड राज्य को बने १० साल हो गये हैं और इन १० सालों में इस राज्य ने तीन सरकारें और अब तक पांच मुख्यमंत्री भी देख लिये हैं। इस बीच सरकारों ने जनता के लिये कई कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत की और इन योजनाओं का नाम राष्ट्र और राज्य की महान विभूतियों के नाम पर रखा। इसके अतिरिक्त सड़कों और चौराहों आदि के भी नामकरण विभिन्न विभूतियों के नाम पर होते रहे। लेकिन कष्ट की बात यह है कि लम्बे संघर्ष, ५२ शहादतों और तमाम जलालतों को सहने के बाद इस राज्य में यहां की विभूतियां ही अल्पसंख्यक होकर रह गईं। आज यदि योजनाओं आदि के नाम गिनाने को कहा जाय तो उत्तराखण्ड की विभूतियों के नाम पर गिनी-चुनी ही योजनायें हैं।
चूंकि यह सब बातें जनभावनाओं से जुड़ी हुई हैं और यदि इनका नामकरण राज्य की विभूतियों के नाम पर किया जाये तो लोगों को यह ज्यादा अच्छा (familiar) लगेगा। इसलिये हमारा यह कहना है कि इस मामले का राजनीतिकरण या पार्टीकरण नहीं होना चाहिये। क्योंकि विभूतियां चाहे राष्ट्रीय हों या प्रादेशिक, वे राजनीति या पार्टी से ऊपर होती हैं। इधर देखने में आया कि प्रदेश सरकार ने अपनी पार्टी के राष्ट्रीय स्तर की विभूतियों के नाम पर धड़ाधड़ प्रदेश सरकार की योजनायें शुरु कर दी। हमारा इस बात पर भी विरोध नहीं है, लेकिन विभूतियों का पार्टीकरण नहीं होना चाहिये, यदि आप माननीय अटल जी के नाम पर योजना का नाम रख रहे हैं तो राजीव गांधी जी को भी सम्मिलित करें, दोनों राष्ट्र के गौरव हैं, पार्टियां चाहे जो भी हों। राज्य सरकार को प्राथमिकता तो राज्य की विभूतियों को ही देनी चाहिये, क्योंकि इन विभूतियॊं ने इस राज्य के लिये काम किया है और कई ने अपने बलिदान तक देकर राष्ट्र की रक्षा की है। इसलिये हमारा फर्ज ज्यादा बनता है कि हम इनके कामों को सामने लायें और कुछ ऐसा करें जिससे कम से कम राज्य और देश के लोग इनके बारे में जानें।
इसी प्रकार से उत्तराखण्ड राज्य से कई विभूतियां हैं, जिसमें भारत रत्न गोविन्द बल्ल्भ पन्त जी हैं, जिनके नाम से कई अन्य प्रदेशों तक में सड़के, चौराहे और योजनायें हैं। पद्म विभूषण भैरव दत्त पाण्डे जी हैं, रंगमंच और संगीत से अमलानन्द धस्माना, ब्रजेन्द्र लाल शाह, मोहन उप्रेती, मोहन सिंह रीठागाड़ी जी हैं। राज्य आन्दोलनकारी तो इस प्रदेश का हर नागरिक रहा ही है, शहीदों की भी सूची बड़ी लम्बी है, उत्तराखण्ड के गांधी कहे जाने वाले स्व० इन्द्रमणि बड़ोनी जी का नाम भी हमने इस सूची में नहीं पाया। चिपको आन्दोलन की जननी गौरा देवी, टिंचरी माई, श्रीदेव सुमन, गब्बर सिंह, माधो सिंह भण्डारी, विपिन त्रिपाठी, गंगोत्री गर्ब्याल, नारायण स्वामी, कमलेन्दुमती शाह, ……बड़ी लम्बी फेहरिस्त है हमारी विभूतियों की। यह सब कहना बड़ा कष्टकारी है कि आखिर हम इतने अहसान फरामोश कैसे हो गये। जिन लोगों ने हमारे सुरक्षित भविष्य के लिये अपना वर्तमान कुर्बान कर दिया, हम उन्हीं को भूलते जा रहे हैं। साथ ही अपनी पार्टी में अपने नम्बर बढ़ाने के लिये ऐसे ही नामकरण किये जा रहे हैं। हम यह भूल गये कि जिनकी कुर्बानी और बलिदान से हम इस स्थिति में पहुंचे पाये हैं कि हम योजनायें बना रहे हैं और उनका नामकरण अपने हिसाब से कर रहे हैं। क्या आज हम श्रद्धांजलि स्वरुप अपने राज्य की कुछ योजनाओं का नामकरण उनके नाम पर नहीं कर सकते जिसके माध्यम से उनकी याद को अक्षुण्ण किया जा सके।
bhut khub aapki soch neak hai
yadi phaad k prati her ek yuva or yaahaan ka nagarik soche to
or apne ko yaan k parti thoda b samrpit kere to hum dunia me
cha jane ka jujba rakhte hai
jai uttarakhand